कैसे और क्यों फेल हुआ सहारा इंडिया परिवार और सुब्रत रॉय सहारा ??

संस्कृत में एक श्लोक का एक भाग है – वासुदैव कुटुंबकम। जिसका हिंदी में मतलब होता है – पूरा संसार अपना ही है। शायद इसी तर्ज पर चलते हुए सुब्रत राय सहारा ने अपने कम्पनी का नाम रखा था – सहारा इंडिया परिवार। पूरा इंडिया को ही वो अपना परिवार बना चुके थे। और यह बात सच भी है। सहारा एक समय में हिंदुस्तान की दूसरी सबसे बड़ी जॉब देने वाली कम्पनी थी। पहले नंबर पर अभी भी इंडियन रेलवे ही था। लेकिन फिर क्या हुआ कि सहारा कम्पनी दिवालिया हो गयी और उसके मालिक सुब्रत राय को जेल जाना पड़ा। सबकुछ जानेंगे इस केस स्टडी में। तो चलिए, शुरू से शुरू करते हैं।

थोड़ी सी बचपन के बारे में जान लेते हैं

सहारा कम्पनी के फाउंडर सुब्रत राय सहारा का जन्म 10 जून 1948 को बिहार राज्य के अररिया जिले में हुआ था। पढाई-लिखाई इनकी होली चाइल्ड स्कुल कोलकाता में हुई और फिर मेकेनिकल इंजीनियर बने गोवर्नमेंट टेक्नीकल कॉलेज गोरखपुर से। पढाई करने के बाद ज्यादातर लोग नौकरी के पीछे भागते हैं, लेकिन यह जनाब बिजनेस की तरफ भागे और गोरखपुर में ही अपना पहला बिजनेस स्टार्ट किया। इनका बिजनेस वक्त के साथ इतना बड़ा हो गया कि वो हर क्षेत्र में अपना पेअर पसारने लगे। मसलन रियल एस्टेट, एजुकेशन, हेल्थकेयर, हॉस्पिटैलिटी, मिडिया, टूरिज्म, एंटरटेनमेंट और फाइनेंसियल सर्विसेस।

इन सभी क्षेत्रों में  एक साथ काम करते हुए सहारा के पास लगभग 14 लाख से ज्यादा एम्प्लॉई हो गया था। अपने ब्रांड सहारा को देश और विदेश में ज्यादा से ज्यादा प्रोमोट करने के लिए वो भारतीय क्रिकेट और हॉकी टीम को स्पॉन्सर करना शुरू कर दिए। बीसीसीआई के साथ सहारा ग्रुप का टाईअप ग्यारह सालों तक रहा।

अब कंपनी को जानिए. . . .

तो ये थी कम्पनी के बनने की कहानी, लेकिन हम यहाँ पर आपको बताने के लिए आए हैं आपको कम्पनी के बिगड़ने की कहानी। वो भी पुरे विस्तार से। इस केस स्टडी में हम कुछ फाइनेंसियल टर्म्स का यूज करने वाले है, क्योंकि बिना इसके इस स्टोरी को नहीं कर सकते। आपको सबकुछ सही-सही और आसानी से समझ में आ जाए इसके लिए हम कुछ फाइनेंसियल टर्म्स का फुल-फॉर्म आपको बता दे रहे हैं:

IPO – इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग
DRHP – Draft Red Herring Prospectus
SEBI – Securities and Exchange Board of India
OFCD – (Optionally Fully Convertible Debentures 
ROC – Registrar of Company
ED – Enforcement Directorate

इतने टर्म्स काफी हैं आपको पुरे स्कैम को समझने के लिए।

कैसे हुआ घोटाले का खुलासा. . ??

बात है 30 सेप्टेम्बर 2009 की। इस दिन सहारा ग्रुप की एक कंपनी सहारा प्राइम सिटी ने अपने IPO के लिए SEBI के साथ DRHP फाइल की। आईपीओ यानि इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग। जब कोई कंपनी पहली बार स्टॉक मार्किट के जरिये पब्लिक से पैसा उठाती है तो उसे आईपीओ यानि इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग कहते हैं। और DRHP कंपनी का एक तरह का पूरा बायोडाटा होता है। जिसमे कंपनी की लगभग सभी डिटेल्स होती है जैसे कि कंपनी का पास्ट परफॉरमेंस, उस ग्रुप के बाकी कंपनी के फाइनेंसियल डिटेल्स, कंपनी को किसलिए फंड की जरुरत है इत्यादि। तो जब SEBI के ऑफिसर्स ने इस फाईल को जांच करना शुरू किया तो देखा कि सहारा ग्रुप की दो कंपनी “सहारा इंडिया रियल एस्टेट कारपोरेशन(SIRECL)” और “सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन(SHICL)” में कुछ गड़बड़ है। SEBI को यह लगा कि भैया ये दोनों कम्पनी ने जो फंड उठाया है अब तक उसका प्रोसेस कुछ ठीक नहीं है।

अमिताभ बच्चन और अमर सिंह के साथ सुब्रत रॉय सहारा

इसी के लगभग दो महीने बाद 25 दिसंबर 2009 और 4 जनवरी 2010 को SEBI को इन दो कम्पनी के खिलाफ कम्प्लेंट्स मिली। जिसमे यह लिखा गया था कि सहारा ग्रुप की ये दो कम्पनीज गलत तरीके से OFCD इशू करके फंड उठा रहा है। OFCD मतलब Optionally Fully  Convertible  Debentures। यह Debenture एक डेब्ट इंस्ट्रूमेंट है जिसका इस्तेमाल करके कम्पनीज लोगों से पैसा उधार लेती है और बदले में उन्हें इंटरेस्ट देती है। अब इन दो कम्प्लेंट्स की वजह से SEBI का शक सही साबित हुआ और SEBI ने इन दो कम्पनीज पर अपना इन्वेस्टीगेशन शुरू की और सहरा ग्रुप ने अब तक जो भी फंड उठाये थे उसका क्लैरिफिकेशन्स माँगा।

कंपनी सम्बंधित नियम क्या है भारत सरकार का. .??

अब भारत सरकार का एक नियम यह है कि जब किसी कंपनी को अपनी OFCD 50 से कम लोगों को इशू करने होते हैं तब उन्हें ROC (Registrar of Company) से परमिशन लेनी होती है। और कंपनी को जब 50 या 50 से ज्यादा लोगो को OFCD इशू करने होते है तब उन्हें SEBI से परमिशन लेनी होती है।

सहारा ग्रुप की दो कंपनी “सहारा इंडिया रियल एस्टेट कारपोरेशन” और “सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन” ने करीब ढाई करोड़ इन्वेस्टर्स से लगभग चौबीस हजार करोड़ रूपये की फंडिंग उठायी थी। सहारा ग्रुप पर यह भी आरोप लग रहे थे कि जो फंडिंग उठायी गयी है और जहाँ पर इस फंडिंग का यूज हुआ है उसका कुछ पता ही नहीं है। मतलब सबकुछ हवा में ही हो रहा था। अब यहाँ पर एक लूपहोल और निकल कर सामने आया कि ये दोनो कम्पनीज ने SEBI के परमिशन के बिना करीब ढाई करोड़ लोगों को अपने OFCD इशू किये थे।

नियम के मुताबिक कंपनी को 6 हफ्ते के भीतर ही OFCD के जरिये फंड उठाने की प्रोसेस करनी पूरी होती है। पर यहाँ इन दोनों कम्पनी दो साल से भी ज्यादा टाइम से लगातार OFCD के जरिये फंड उठा रहे थे। इस तरह के गैरकानूनी हरकतों के चलते SEBI ने दोनों कपनियों को OFCD के जरिये फंड उठाने पर रोक लगा दी और सहारा ग्रुप को इन्वेस्टर्स के पैसे 15% ब्याज के साथ लौटने का आर्डर दिया।

जब बात कोर्ट में गयी तब क्या हुआ. . ??

अब मामला सेबी से उठकर कोर्ट तक आ गया। सेबी के इस आर्डर को सहारा ग्रुप ने इलाहबाद हाई कोर्ट में चैलेंज किया और दिसंबर 2010  में इलाहबाद हाई कोर्ट ने सेबी के आर्डर पर रोक लगा दी। फिर सेबी ने कुछ और दलीलें कोर्ट में पेश की। जिसके बाद अप्रैल 2011 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने ये रोक हटा दी। अब गेंद फिर से सहारा के पाले में थी। इस बार सहारा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब सुप्रीम कोर्ट ने SAT यानी कि Securities Appellate Tribunal को इसकी जांच करने को कहा। फिर SAT ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपते वक़्त ये कहा कि सेबी सही है और इन्वेस्टर्स के पैसे 15% इंटरेस्ट के साथ सहारा को लौटाना होगा।

अब सहारा ग्रुप की बौखलाहट अपने चरम पर थी। वो SAT के रिपोर्ट को भी नहीं मान रहे थे और इस रिपोर्ट को वो फिर से सुप्रीम कोर्ट में चैलेन्ज कर दिया।  इस बार सुप्रीम कोर्ट में सहारा का दलील यह था कि इन दो कपनियों का OFCD इशू पब्लिक इशू नहीं था। वो एक प्राइवेट तरीके से मैनेज किया गया था। जो सिर्फ और सिर्फ सहारा ग्रुप से जुड़े लोगों के लिए ही था। और तो और ये दो कम्पनी भी ROC से लिस्टेड नहीं है। इसीलिए ये केस सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।

सहारा के इस दलील के बाद अब बारी थी सेबी की। सेबी ने बोला कि OFCD के प्राइवेट तरीके से 50 से कम इन्वेस्टर्स से पैसा उठाया जा सकता है और इन दो कम्पनी ने 50 से ज्यादा लोगों से OFCD के जरिये फंड उठाया है। जिसके लिए सेबी से परमिशन लेना अनिवार्य है जो कि उन्होंने नहीं ली थी। और जब OFCD 50 या 50 से जायदा इन्वेस्टर्स को इशू किया जाता है तब वो पब्लिक इशू बन जाता है और सेबी के अंडर आता है। यहाँ पर सेबी ने जो सबसे मज़बूत दलील पेश किया वो यह था कि सिक्योरिटीज एक्ट के अनुसार OFCD भी एक सिक्योरिटी है। और इसीलिए OFCD SEBI के जूरिस्डिक्शन में आती है। इस तरह से सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में यह प्रूव किया कि ये केस उनके ही जूरिस्डिक्शन में आती हैं। और वह ही इस केस को सहारा के खिलाफ लड़ेगा।

सहारा वाली जर्सी में भारतीय क्रिकेटर

यहाँ से सेबी ने इस केस को गंभीरता से लिया और सेबी के तब के बोर्ड मेंबर डॉ K M Abraham को इस केस को इन्वेस्टीगेट करने को कहा। उन्होंने इन दो कंपनियों के चार रैंडम OFCD इन्वेस्टर का वेरिफिकेशन किया। इस वेरिफिकेशन में सिर्फ दो इन्वेस्टर से ही संपर्क हो पाया। और जो दो इन्वेस्टर्स मिला उसका सहारा ग्रुप से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। इस रिपोर्ट को सेबी ने कोर्ट में बताया और साथ में यह भी बताया कि शायद हो सकता है सहारा ग्रुप इन दोनों कंपनियों के द्वारा फ्रॉड इन्वेस्टर्स के नाम पर मनी लॉन्डरिंग कर रहे हैं।

सहारा दोषी कब साबित हुआ. . ??

अब आता है साल 2012 का अगस्त महीना। सेबी के तमाम दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को दोषी माना। और साथ ही उन OFCD  होल्डर्स का पूरा पैसा 15% इंटरेस्ट के साथ नब्बे दिनों यानी कि 3 महीनो के अंदर सेबी के पास जमा करने को कहा। साथ ही अपने सभी  OFCD होल्डर्स के डिटेल्स सेबी के पास जमा करने के लिए कहा। ताकि सेबी उन पैसों को उनके सही इन्वेस्टर्स तक पहुंचा सके।

अब यहाँ से सहारा फ्रस्टेशन के बाद मजाक पर उतारू हो गया। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद सहारा ग्रुप ने करीब 130 ट्रक्स भरके OFCD  होल्डर्स के डिटेल्स सेबी को भेजे थे। इसमें से कुछ ट्रक्स ऐसे भी थे जो डेडलाइन खत्म होने के बाद आने की वजह से सेबी ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया था। उन सभी डाक्यूमेंट्स का इन्वेस्टीगेशन करने के बाद SEBI को यह पता चलता है कि सहारा ग्रुप ने जो इन्वेस्टर्स के डिटेल्स भेजे हैं उनमे इन्वेस्टर्स के सही-सही डिटेल्स नहीं लिखे हुए हैं। लगभग 90% डॉक्युमेंट्स आधे-अधूरे भरे हुए थे। इसीलिए SEBI ने कोर्ट से कहा था कि उन्हें ये मामला मनी लॉन्डरिंग का भी लग रहा है। क्योंकि वो लोग तो कहीं दिख ही नहीं रहे हैं जिनसे पैसे लिए गए थे।

सेबी ने यह बात कोर्ट को बताया। कोर्ट मान गया और फिर सहारा को तीन इंस्टॉलमेंट्स में पैसे डिपाजिट करने को कहा। तब कोर्ट में सहारा ने जज कहा था कि मैं आपके सारे रूपये लौटा दूंगा। इस पर जज ने कहा था कि आप ऐसे मत बोलिए कि पैसे मुझे लौटा देंगे, लोग गलत मतलब निकाल लेंगे इसका। आप ये कहिए कि आप अपने इन्वेस्टर्स का पैसा लौटा देंगे। फिर सहारा ने वैसा ही बोला। सहारा ग्रुप ने 5120  करोड़ रुपये का पहला इन्सटॉलमेंट सेबी के पास समय से डिपाजिट किया। लेकिन बाकी के दो इंस्टॉलमेंट्स को टाइम पर डिपाजिट नहीं किया था और इसके पीछे बहाना यह था कि हमने पहले ही बाकी इन्वेस्टर्स के पैसे उन्हें लौटा दिए है।

ढाई करोड़ इन्वेस्टर्स कहाँ गए. . ??

इतना बवाल काटने के बाद जब सेबी इन्वेस्टर्स के पैसे लौटाने लगे तब सिर्फ 4600 ऐसे इन्वेस्टर्स आये जिन्होंने अपने पैसे को क्लेम किया था। कहाँ ढाई करोड़ और कहा 4600। इसपर सहारा ग्रुप ने कहा था कि इन्वेस्टर्स इसीलिए पैसे क्लेम करने नहीं आ रहे हैं क्यूंकि हमने उनके पैसे वापस कर दिए हैं। लेकिन जनाब,कोर्ट तो कोर्ट होता है। जो भी बोलो उसका सबूत दिखाना होता है और कोर्ट ने यहाँ सहारा को फिर से धर लिया।

कोर्ट ने सहारा से इन्वेस्टर्स को पैसा वापस किये जाने का प्रूफ माँगा और इन्वेस्टर्स को वापस करने के लिए उनके पास जो पैसे आए उनका सोर्स पूछा। लेकिन सहारा ग्रुप ने कोई भी प्रूफ नहीं दिया और पैसे के सोर्स के बारे में भी कुछ नहीं बताया। नहीं बताया, क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।

अब सेबी और कोर्ट दोनों पूरी तरह से समझ चुके थे कि ये पूरा प्रोसेस ही मनी लॉन्ड्रिंग का था। कोर्ट ने यह भी आशंका जताया कि हो सकते हैं इनमे से ज्यादातर इन्वेस्टर्स ग्रामीण एरिया से है जिन्हे OFCD के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। दूसरा तर्क यह भी हो सकता है कि सहारा ने काल्पनिक इन्वेस्टर्स के नाम पर मनी लॉन्डरिंग की है। जिनका नाम सिर्फ पेपर पर ही है। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से यहाँ पर ये कह सकता हूँ कि ज्यादातर इन्वेस्टर्स ग्रामीण इलाके से ही थे।

अब तक मामला कहाँ तक पहुंचा है. .??

इतना होते-होते अब आ चूका था साल 2014। क्योंकि सहारा को जब कोर्ट ने तीन इंस्टॉलमेंट्स में पैसा देने को कहा था तो सहारा एक इन्स्टालमेन्ट देकर सो गया। अब वो किसी की सुध ही नहीं ले रहा था। तब जाकर सेबी ने सहारा का पहले तोबैंक अकाउंट सील किया और फिर बाद में उसके प्रॉपर्टीज को जब्त किया। सुब्रत राय सहारा की आँखें अब तक नहीं खुली थी तो सुप्रीम कोर्ट ने फिर 26 फरवरी 2014 को ये आदेश दिया कि सुब्रत राय सहारा को अरेस्ट किया जाए। हुकुम की तामील हुई और 28 फरवरी 2014 को सहारा को गिरफ्तार कर लिया गया। साल 2017 के नवम्बर महीने में ED ने भी सहारा पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस कर दिया। जिसकी जाँच अभी तक चल रही है।

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