कहानी बाहुबली विधायक अनंत सिंह की: जिसे लोग मगहिया डॉन और छोटे सरकार भी कहते हैं।

बिहार के जंगलराज में अनंत सिंह भी बराबर के हिस्सेदार हैं, लालू के साथ ना होने से कभी भी प्रत्यक्ष रूप से इनका नाम सामने नहीं आया।

नब्बे के दशक में जब बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में राष्ट्रिय जनता दल की सरकार आयी तभी से कई क्राइम ऐसे थे जो ऑर्गनाइज्ड ढंग से होने लगे। मसलन हत्या, अपहरण, लूट-पाट और ऐसे ही कई जघन्य अपराध। अपराध था तो अपराधी भी थे। कुछ सरकारी तंत्र से मिले हुए थे तो कुछ बिना सरकार के सह के अपने आप को आगे बढ़ा रहा था। जो सरकारी तंत्र के साथ रहकर काम कर रहा था उसमें मोहम्मद शहाबुद्दीन, सूरजभान सिंह, आनंद मोहन सिंह जैसे नेता थे जो अपने-अपने क्षेत्र में बाहुबली विधायक के रूप में जाने जाते थे। वहीं दूसरी तरफ था अनंत सिंह, जो बिना किसी सरकारी तंत्र की सहायता से आगे बढ़ रहा था। अभी बीते 16 अगस्त 2019 को अनंत सिंह को अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया है जिसमें उसके पैतृक गाँव लदमा वाले घर से एके-47 रायफल, मैगजीन, जिन्दा कारतूस और दो हैंड ग्रेनेड बरामद हुआ है।

आखिरी गिरफ्तारी के वक्त अनंत सिंह के चेहरे पर खौफ साफ मालुम पड़ रहा था। दूसरी तस्वीर में बरामद एके-47 और गोलियाँ।

उसकी गिरफ्तारी दिल्ली से हुई है। तो आइए जानते हैं आज अनंत सिंह के इतिहास के बारे में सबकुछ सिलसिलेवार ढंग से ताकि आप कहानी की भयावहता को जान सकें।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

पटना से लगभग 80 किलोमीटर दूर बढ़ के नजदीक नदावन गाँव में उनका जन्म हुआ था। उस समय के बिहार के सामंती समाज में अपराध सामाजिक वर्चस्व का औजार था। यहाँ हर जाति के अपने अपराधी रहे हैं। उनके समुदाय ने उन्हें नायक का दर्जा दिया, उनका महिमामंडन किया और उसको नेता-कम-भगवान बना डाला। लंबे समय तक बिहार की संपन्न सवर्ण जातियों के बीच सामाजिक हैसियत को लेकर लड़ाई चलती रही और उनके बीच से दबंग निकलते रहे। बिहार में रोजगार की कमी भी अपराध का एक मुख्य कारण था। जो दबंग होता था उनका एक ही मकसद होता था अपने एरिया के सरकारी ठेके को हथियाना। इसमें कई कामयाब होते थे तो कई नाकामयाब, और इसी दौरान गैंगवार भी खूब देखने को मिलती थी। इन्हीं सब माहौल में अड़े हुए अनंत सिंह ने भी यही रास्ता चुना। वो भी मोकामा में अब दबंग के नाम से जाने जाने लगे। बताते हैं कि अनंत पहली बार उस वक्त जेल गया था जब वह महज 9 साल का था। उसके बाद अपराध की दुनिया में उसने जो जलवा कायम किया, वो अभी तक कायम है।

एक पेशी के दौरान अदालत जाते अनंत सिंह। हाथो में लगी बेरियाँ से भी चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। इससे इसके घमंड का अंदाजा लगता है। नितीश कुमार ने जिन क्रिमिनल को संरक्षण दिया उसमें अनंत सिंह भी एक था।

नब्बे का दशक बिहार के माथे पर लगा वो कलंक है जिससे दशकों तक यह राज्य जूझता रहेगा। समय-दर-समय और शहर-दर-शहर अपराध होते रहे और सरकार चद्दर तानकर सोती रही। कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं क्योंकि सबकुछ रिमोट कंट्रोल से चल रहा था। भले ही अनंत सिंह के ऊपर सरकारी हाथ नहीं था लेकिन वो भी किसी से काम नहीं था। कानून की किताब में शायद ही कोई ऐसी धारा बची हो जिसके तहत अनंत सिंह के नाम पर केस दर्ज न हो। अनंत सिंह पर ढाई दर्जन से अधिक संगीन मामले दर्ज हैं। इनमें कत्ल, अपहरण, फिरौती, डकैती और बलात्कार जैसे तमाम संगीन मामले शामिल हैं। अकेले सिर्फ बिहार के बाढ़ थाने में ही कुल 23 संगीन मामले दर्ज हैं। ये बात दीगर है कि अनंत सिंह अपने रसूख से इनमें से कई मामलों में बरी हो चुके हैं।

जब सोने का मुकुट पहन राजा की तरह किडनैपर्स पर हमला किया था

इसका अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 1990 के दशक में इसके पास के ही गांव के बदमाश ने बाढ़ बाजार से एक व्यापारी को किडनैप कर लिया था। पुलिस कुछ नहीं कर पाई और मामला अनंत सिंह के पास गया। अनंत ने अपने गुर्गों के साथ किडनैपिंग करने वालों के घर पर धावा बोल दिया। दोनों ओर से जबरदस्त गोलीबारी हुई जिसमें कई लोग मारे गए। हालांकि बाद में इस घटना ने जातिवादी रंग ले लिया और मामले में राजनीति शुरू हो गई और कई बड़े नेता भी इस लड़ाई में कूद गए थे। इसी बीच में एक खबर और थी जो सुर्खियां बटोर रही थी। उस वक्त के मिडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जब अनंत सिंह जब किडनैपर्स पर धावा बोलने आया तो वह घोड़े पर सवार होकर सबसे आगे आगे चल रहा था और इतना ही नहीं अनंत सिंह ने अपने सिर पर सोने का मुकुट पहना हुआ था। यह उसका जताने का तरीका था कि वह एरिया उसका है और वही वहाँ का राजा भी है।

क्या हुआ जब एसटीएफ से हुआ था मुठभेड़

साल चल रहा था 2004। अनंत सिंह के घर पर एसटीएफ ने धावा बोला। दोनों तरफ से घंटों गोलीबारी हुई। गोली अनंत सिंह को भी लगी थी। लेकिन वो बच गए। हालांकि, इस एनकाउंटर में उनके आठ लोग मारे गए। इसके बाद उन्होंने दिमाग का इस्तेमाल किया और घर को किले में तब्दील कर लिया। उन्होंने इस मकान में जबरन कुल 50 परिवारों को किराए पर रख लिया। ताकि फिर कभी पुलिस या एसटीएफ उन पर धावा बोले तो ये परिवार उनके लिए ढाल का काम करे। और उनका काम आसान हो जाए।

अनंत सिंह का सियासी सफर

अनंत सिंह ने जुर्म की दुनिया के साथ-साथ सियासी गलियारों में भी अपनी पैठ बढ़ाई और धीरे-धीरे नीतीश कुमार के नजदीक आ गए। 2005 में लालू प्रसाद के खिलाफ चुनाव लड़ने के दौरान नीतीश ने बिहार को अपराधियों से मुक्त करने का वादा तो किया, लेकिन चुनाव जीतने के लिए अनंत का ही सहारा लिया था। उनकी दोस्ती अनंत को बहुत रास आई और नवबंर 2005 में उसे मोकामा से जेडीयू का टिकट मिल गया। इलाके में दबदबा था ही, सो वह चुनाव भी जीत गए। यहां से उनका जुर्म और सियासत दोनों पर राज हो गया।

नितीश कुमार के सत्ता में आने के बाद बिहार में हजारों अपराधियों को अदालतों की ओर से दोषी करार दिया गया था। हजारों अपराधी जेल भेजे गए, जिनमें लालू प्रसाद का करीबी मोहम्मद शहाबुद्दीन भी शामिल था। लेकिन मजाल थी कि कोई अनंत सिंह को छूने की हिम्मत भी करें। कहा तो जाता है कि एक बार नीतीश कुमार को अनंत सिंह ने चांदी के सिक्कों से तौला था। उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले भी सामने आए, लेकिन सरकार के दबाव के चलते पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकी। पुलिस के आला अधिकारी भी उनसे खौफ खाते थे। गिरफ्तारी के बाद भी बिहार के आला अफसर उनके नाम के आगे  “जी” लगाना नहीं भूलते थे।

कहा जाता है इस दौरान अनंत सिंह अलग ही सरकार चलाने लगे थे। मोकामा के लोग उनको “छोटे सरकार” की उपाधि दे दिए और अनंत सिंह खुद को “मगहिया डॉन” बोलने लगा। उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हुए लेकिन सरकार के दबाव में पुलिस अनंत सिंह का कुछ भी नहीं कर सकी। अनंत सिंह के रसूख का अंदाजा यही से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार भी उनके आगे कभी हाथ जोड़े खड़े रहते थे।

राजनीति में कोई भी साफ नहीं रह सकता। नितीश को भी मोकामा जैसे क्षेत्रों में चुनाव जितने के लिए अनंत सिंह जैसे क्रिमिनल से हाथ मिलाना ही पड़ा।

अनंत सिंह ने 2010 में भी जेडीयू के टिकट पर चुनाव जीता लेकिन 2015 में बिहार में विधान सभा चुनाव में जेडीयू ने बढ़ते दबाव की वजह से अनंत सिंह को टिकट नहीं दिया तो वह निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत गया।

रेप और हत्या का मामला

साल चल रहा था 2007। चुनाव जीतने के साथ ही अनंत सिंह ने खुद को बाहुबली के तौर पर स्थापित करने की कोशिश शुरू की। इसी साल यानी कि 2007 में अनंत का नाम एक महिला से बलात्कार और हत्या के मामले में सामने आया। जब एक पत्रकार ने उनसे इस संबंध में सवाल पूछा तो उसकी बेरहमी से पिटाई कर डाली। मामले ने तूल पकड़ा तो अनंत की गिरफ्तारी भी हुई और वह कुछ दिन जेल में भी रहे, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुप्पी साध ली।

इतने मामले में अनंत सिंह को चार्ज किया गया है की उसका पिछले ज्यादातर समय कोर्ट-कचहरी में ही बीता है।

इस घटना के दो साल बाद साल 2009 में हथियारबंद अपराधियों ने अत्याधुनिक असलहों से अंधाधुंध फायरिंग करते हुए जदयू विधायक अनंत सिंह के भाई व शराब व्यवसायी सच्चिदानंद सिंह उर्फ फाजो सिंह (60 वर्ष) समेत दो को भून डाला। बुधवार की शाम 6 बजे बाढ़ स्टेशन रोड स्थित फाजो के अपने मार्केट परिसर में ही यह घटना हुई। इस घटना में दो लोग मारे गए थे दूसरा व्यक्ति फाजो का मैनेजर अवधेश सिंह था।

विधायक बनने के पांच साल बाद ही अनंत सिंह की संपत्ति कई गुना बढ़ गई। 2005 में अनंत सिंह ने अपने चुनावी हलफनामे में 3 लाख 40 हजार रुपये की मामूली संपत्ति होने की घोषणा की थी, जो 2010 में बढ़कर 38 लाख 84 हजार रुपये तक पहुंच गई।

बाढ़ बाजार में दादागिरी के किस्से

2015 के जून महीने में अनंत सिंह के परिवार की किसी महिला के साथ पटना के बाढ़ बाजार इलाके में चार युवकों ने छेड़खानी कर दी थी। खबर जैसी ही अनंत सिंह तक पहुंचती है, पटना के उनके विधायक आवास से गुंडों से भरी एक गाड़ी निकली। चारों लड़कों को भरे बाजार से उठाया जाता है। पुलिस के पहुंचने तक चार में से तीन लड़के तब तक बुरी तरह पिट चुके थे और एक का पता नहीं था। पुलिस अनंत सिंह के पांच गुंडों को गिरफ्तार कर लेती है। कहा जाता है इसको लेकर काफी हंगामा हुआ था। आरोप है कि अनंत सिंह के इशारे पर उनके गुर्गों ने चारों युवकों को अगवा किया था, जिनमें से एक युवक की दर्दनाक तरीके से हत्या कर दी गई थी। अगले दिन उसका शव जंगल में पड़ा मिला था।

अनंत सिंह के शौक भी अनंत है

2013 में अनंत फिर चर्चा में आए जब वह अपनी शानदार मर्सडीज छोड़कर बग्घी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे। पटना की सड़क पर खुद बग्घी चलाकर निकला और देखने वाले देखते रह गए। पूछे जाने पर अनंत ने कहा, मैंने दिल्ली से बग्घी बनवाई और यहां लेकर आया। मैं तब से इसकी सवारी का मजा ले रहा हूं और इसमें ईंधन भी नहीं लगता। खास बात ये है कि इस बग्घी में लाइट और म्यूजिक सिस्टम भी लगा हुआ है। सवारी के दौरान बैकग्राउंड में एक गाना भी चल रहा था, हम हैं मगहिया डॉन, लोग कहें छोटे सरकार। ये गाना एक भोजपुरी फिल्म के लिए तैयार किया गया था जिसमें खुद अनंत सिंह अभिनय करने वाले थे।

अनंत सिंह की राजनीति में जनता का का फायदा कम और उसके खुद का फायदा ज्यादा हुआ।

2007 में जानवरों के मेले में वह लालू यादव का घोड़ा लेकर पहुंचे थे। अनंत सिंह को पता था कि लालू उन्हें अपना घोड़ा नहीं बेचेंगे, इसलिए उन्होंने किसी और के जरिए घोड़ा खरीदा था। अजगर पालने जैसी अपनी सनक के लिए चर्चित ये विधायक पहले भी कई विवादों में फंस चुके हैं। मसलन, दूसरे की मर्सिडीज का मनमाने ढंग से दबावपूर्वक इस्तेमाल करना या फिर एक कार्यक्रम के दौरान हवाई फायरिंग करना भी उनके रिकॉर्ड में दर्ज है।

हमेशा बॉडीगार्ड से घिरे रहने वाले अनंत सिंह के आतंक का इससे भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसने बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी को धमकाया था। उसने यह धमकी तब दी थी जब मांझी ने नीतिश कुमार के खिलाफ बगावत की थी। इससे पहले अनंत नीतीश सरकार में मंत्री रहीं परवीन अमानुल्लाह को भी खुल्लेआम धमकी दे चुका था।

अनंत कुमार सिंह उर्फ छोटे सरकार की कहानी ठीक वैसी ही है, जैसी बॉलीवुड की हिंदी मसाला फिल्मों में दिखाई जाती है। अब जब वह गिरफ्तार हो चूका है तो उनका मूंछों पर ताव देता हुआ वह पुराण अराउब भी गायब हो गया है। पटना के बेउर जेल जाते समय ना तो उसके आंखों पर काला चश्मा था और ना ही उसके चेहरे पर निडर वाला भाव। अब कानूनी शिकंजा कास गया है तो देखते हैं कहाँ तक जाता है।

वीडियो: देखिए क्यों नितीश कुमार और तेजस्वी यादव दोनों अनंत सिंह को गुंडा बोल रहे हैं?

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