जाह्नवी – जैनेन्द्र कुमार की कहानी

आज तीसरा रोज़ है। तीसरा नहीं, चौथा रोज़ है। वह इतवार की छुट्टी का दिन था। सबेरे उठा और कमरे से बाहर की ओर झांका तो देखता हूं, मुहल्ले के एक मकान की छत पर कांओं-कांओं करते हुए कौओं से घिरी हुई एक लड़की खड़ी है। पूरा पढ़ें...

जाह्नवी – जैनेन्द्र कुमार की कहानी

तत्सत् – जैनेन्द्र कुमार की कहानी

एक गहन वन में दो शिकारी पहुँचे। वे पुराने शिकारी थे। शिकार की टोह में दूर-दूर घूम रहे थे, लेकिन ऐसा घना जंगल उन्हें नहीं मिला था। देखते ही जी में दहशत होती थी। वहाँ एक बड़े पेड़ की छाँह में उन्होंने वास किया और आपस में बातें करने लगे। पूरा पढ़ें...

तत्सत् – जैनेन्द्र कुमार की कहानी

शिकार को निकला शेर – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक शेर एक रोज जंगल में शिकार के लिए निकला। उसके साथ एक गधा और कुछ दूसरे जानवर थे। सब-के-सब यह मत ठहरा कि शिकार का बराबर हिस्‍सा लिया जाएगा। पूरा पढ़ें...

शिकार को निकला शेर – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

सौदागर और कप्तान – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक सौदागर समुद्री यात्रा कर रहा था, एक रोज उसने जहाज के कप्‍तान से पूछा, ''कैसी मौत से तुम्‍हारे बाप मरे?"कप्‍तान ने कहा, ''जनाब, मेरे पिता, मेरे दादा और मेरे परदादा समंदर में डूब मरे।'' पूरा पढ़ें...

सौदागर और कप्तान – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

महावीर और गाड़ीवान – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक गाड़ीवान अपनी भरी गाड़ी लिए जा रहा था। गली में कीचड़ था। गाड़ी के पहिए एक खंदक में धँस गए। बैल पूरी ताकत लगाकर भी पहियों को निकाल न सके। पूरा पढ़ें...

महावीर और गाड़ीवान – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

कंजूस और सोना – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक आदमी था, जिसके पास काफी जमींदारी थी, मगर दुनिया की किसी दूसरी चीज से सोने की उसे अधिक चाह थी। इसलिए पास जितनी जमीन थी, कुल उसने बेच डाली और उसे कई सोने के टुकड़ों में बदला। पूरा पढ़ें...

कंजूस और सोना – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

गधा और मेंढक – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक गधा लकड़ी का भारी बोझ लिए जा रहा था। वह एक दलदल में गिर गया। वहाँ मेंढकों के बीच जा लगा। रेंकता और चिल्‍लाता हुआ वह उस तरह साँसें भरने लगा, जैसे दूसरे ही क्षण मर जाएगा। पूरा पढ़ें...

गधा और मेंढक – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

दो घड़े – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक घड़ा मिट्टी का बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पर रखना चाहा। पूरा पढ़ें...

दो घड़े – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

‘भेड़िया, भेड़िया’ – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

एक चरवाहा लड़का गाँव के जरा दूर पहाड़ी पर भेड़ें ले जाया करता था। उसने मजाक करने और गाँववालों पर चड्ढी गाँठने की सोची। दौड़ता हुआ गाँव के अंदर आया और चिल्‍लाया, पूरा पढ़ें...

‘भेड़िया, भेड़िया’ – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

हिरनी – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी

कृष्णा की बाढ़ बह चुकी है; सुतीक्ष्ण, रक्त-लिप्त, अदृश्य दाँतों की लाल जिह्वा, योजनों तक, क्रूर; भीषण मुख फैलाकर, प्राणसुरा पीती हुई मृत्यु तांडव कर रही है। पूरा पढ़ें...

हिरनी – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी